45 years of Chipko movement

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चिपको आन्दोलन की 45 वीं वर्षगाँठ – गूगल द्वारा डूडल से सम्मान

चिपको आन्दोलन मुख्य रूप से एक वन संरक्षण आन्दोलन है.  यह आन्दोलन वर्ष 1974 में प्रारम्भ हुआ, तब उत्तराखंड राज्य उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था. जब चमोली जनपद के जंगलों में वन विभाग द्वारा पेड़ों की कटाई की जाने वाली थी तब स्थानीय महिलाये पेड़ों से चिपक गयी, और नारे लगाते हुए कहने लगी की पहले हमें काटो फिर पेड़ों को. महिलाओं के इस आन्दोलन के सामने वन विभाग के ठेकेदारों की एक न चली और उन्हें खाली हाथ वापिस लौटना पड़ा.

चिपको आन्दोलन पूर्ण रूप से गांधीवादी एवं सत्याग्रह के तरीकों से प्रेरित था. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन संरक्षण में इस आन्दोलन का विशेष महत्व है. सन 1987 में इस आन्दोलन को सम्यक जीविका पुरुस्कार (Right livelihood Award) से सम्मानित किया गया. इस आन्दोलन के चलते उत्तर प्रदेश में सन 1980 से 15 वर्षों के पेड़ों की कटाई प्रतिबंधित कर दी गयी थी.

चिपको आन्दोलन का मुख्य घोष वाक्य –

क्या है जंगल के उपकार, मिट्टी पानी और बयार
मिट्टी, पानी और बयार जिन्दा रहने के आधार

चिपको आन्दोलन की मुख्य भूमिका में महिलाये ही थी, जिनमे से प्रमुख रूप से गौरा देवी, सुदेशी देवी, बचनी देवी, देव सुमन, मीरा बहन, सरला बहन आदि शामिल थे. चंडी प्रसाद भट्ट भी इस आन्दोलन से जुड़े रहे.

इससे पहले पंडित नैन सिंह रावत के सम्मान में भी गूगल द्वारा डूडल प्रदर्शित किया गया था.

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