Uttarakhand Rajy Aandolan - Part 1

सर्वप्रथम उत्तराखण्ड राज्य की मांग श्रीनगर में 5-6 मई 1938 में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में हुई, अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे श्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने भी इसका समर्थन किया. उस समय जो आज में उत्तराखण्ड राज्य है तब वह आधा हिस्सा अंग्रेजी शाशन और टिहरी राज्य राजा के अधीन था. श्री देव सुमन ने टिहरी राज्य के खिलाफ आन्दोलन किये , सन 1938 में पृथक राज्य की मांग करते हुए उन्होंने गढ़देश सेवा संघनामक संगठन की स्थापना की, बाद में इसका नाम हिमालय सेवा संघकर दिया गया।
आजादी से पहले सन 1946 में हल्द्वानी में बद्रीदत्त पांडे की अध्यक्षता में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक सम्मेलन में उत्तरांचल के पर्वतीय भू-भाग को विशेष वर्ग में रखने की मांग उठायी। इसी सम्मलेन में अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने गढ़वाल- कुमांऊ को मिलाकर एक छेत्रीय भौगोलिक इकाई के रूप में गठित करने की मांग की. संयुक्त प्रान्त के तत्काल्लीन प्रीमियर गोविन्द बल्लभ पंत ने इस मांग को ठुकरा दिया।
सन 1947 में देश को आजादी मिलने एवं 1949 में टिहरी राज्य के भारत में विलय के पश्चात्, 1950 में हिमांचल और उत्तराखण्ड को मिलाकर एक वृहद् हिमालयी राज्य बनाने के उद्देश्य से पर्वतीय विकास जन समिति का गठन किया गया।
भारत सरकार द्वारा राज्य पुनिर्माण के लिए गठित फजल अली आयोगने उत्तर प्रदेश की पुनर्गठन की बात की और एक नया पृथक राज्य बनाने की मांग की लेकिन तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रियों ने इसे ख़ारिज कर दिया. सन 1957 में टिहरी के राजा मानवेन्द्र शाह ने अपने स्तर पर पृथक राज्य आन्दोलन चलाया।
अब प्रदेश के विभिन्न भागों में पृथक राज्य की मांग उठने लगी थी. इसी क्रम में रामनगर में 25 जून 1967 को पर्वतीय राज्य परिषद् का गठन हुआ. दया कृष्ण पांडे इसके अध्यक्ष चुने गये. उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इस छेत्र के विकास के लिए कदम उठाने शुरु कर दिए और 1969 में पर्वतीय विकास परिषद्की संरचना की। 1970 में उत्तरांचल परिषद्का गठन हुआ और इसी वर्ष 3 अक्टूबर 1970 को पी.सी.जोशी के नेतृत्व में कुमाऊ राष्ट्रीय मोर्चा का गठन हुआ। 1972 में उत्तरांचल परिषद् के कार्यकर्ताओं ने बोट क्लब (नई दिल्ली) में धरना दिया. सन 1973 में चमोली के विधायक प्रताप सिंह नेगी के नेतृत्व में बद्रीनाथ से बोट क्लब तक पैदल यात्रा की गयी और दिल्ली चलोका नारा दिया गया. अब युवा भी पृथक राज्य की मांग आन्दोलन में कूद पड़े. सन 1967 मेंउत्तराखण्ड युवा परिषद्का गठन हुआ. 1978 में परिषद् द्वारा संसद का घेराव करने की कोशिश भी की गयी।
राज्य आन्दोलन के लिए सबसे महत्वपूर्ण वर्ष 1979 माना जा सकता है. इसी वर्ष त्रेपन सिंह नेगी (सांसद, जनता दल) के नेतृत्व में उत्तरांचल राज्य परिषद्का गठन हुआ. और तत्काल्लीन प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई को ज्ञापन सौंपा. 25 जुलाई को मसूरी में आयोजित पर्वतीय जन विकास सम्मलेन में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का उदय हुआ. कुमाऊ विश्वविध्यालय के कुलपति डॉ. देवीदत्त पंत को अध्यक्ष चुना गया. राज्य की समस्याओं का निराकरण करते हुए 8 पहाड़ी जिलों को मिलाकर एक नया राज्य की स्थापना करना इसका मुख्य उद्देश्य था।

आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन द्वारा सन १९८४ में पृथक राज्य की मांग को लेकर गढ़वाल में ९०० किलोमीटर की साइकिल यात्रा कर जागरूकता फैलायी
सन १९८७ में उत्तराखण्ड क्रांति दल का विभाजन हुआ और अब कशी सिंह ऐर्री के हाथों में पार्टी की बागडोर आ गयी थी। उत्तराखण्ड क्रांति दल द्वारा 9 मार्च को पौड़ी में आयोजित एक रैली में १०००० से भी अधिक लोगों ने भाग लिया और 9 सितम्बर को उत्तराखण्ड बंद का
आयोजन भी किया गया। दिल्ली के बोट क्लब में एक विशाल प्रदर्शन के बाद उत्तराखण्ड क्रांति दल ने राष्ट्रपति को पृथक राज्य के लिए ज्ञापन सौंपा। हरिद्वार को पहली बार उत्तराखण्ड में शामिल करने की मांग इसी ज्ञापन में की गयी थी। २३ अप्रैल १९८७ में उक्रांद उपाध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार ने राज्य मांग के लिए संसद में एक पत्र बम फेंका।  सन १९८७ में भारतीय जनता पार्टी की अल्मोड़ा में हुए पार्टी सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे लाल कृष्ण आडवानी ने उत्तर प्रदेश के पर्वतीय छेत्र को अलग राज्य का दर्जा देने की माँग को स्वीकार गया लेकिन उत्तराखण्ड के बजाय उत्तरांचल नाम स्वीकार किया गया।

सन १९८८ में भाजपा के सोबन सिंह जीना की अध्यक्षता में “उत्तरांचल उत्थान परिषद्” का गठन किया गया।  सन १९८९ में सभी संगठनो ने संयुक्त आन्दोलन चलाने के लिए “उत्तरांचल संयुक्त संघर्ष समिति” का गठन किया।  

उत्तराखण्ड क्रांति दल के विधायक जसवंत सिंह बिष्ट ने सन १९९० में उत्तर प्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य का पहला प्रस्ताव रखा। भाजपा ने १९९१ के उत्तर प्रदेश चुनाव में अपने घोषणा पत्र में पृथक राज्य की मांग को शामिल किया।  चुनाव जीतने के पश्चात २० अगस्त १९९१ में भाजपा की राज्य सरकार ने केंद्र के पास प्रस्ताव भेजा, केंद्र की कांगेस सरकार ने इसपे कोई निर्णय नहीं लिया। जुलाई १९९२ में उत्तराखण्ड क्रांति दल ने एक महत्वपूर्ण दस्तावेज जारी कर गैरसैण को पृथक राज्य की राजधानी घोषित किया। इस दस्तावेज को उत्तराखण्ड क्रांति दल का ब्लू प्रिंट माना गया है। २१ जुलाई १९९२ को कशी सिंह ऐरी ने गैरसैण में प्रस्तावित राजधानी की नींव डाली और उसका नाम वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर चंद्रनगर रखा।  जनवरी १९९३ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने नगर विकास मंत्री रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में उत्तराखण्ड राज्य की संरचना और राजधानी पर विचार हेतु एक कैबिनेट समिति का गठन किया, जिसे कौशिक समिति के नाम से जाना जाता है।

कौशिक समिति ने मई १९९४ में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमे तत्कालीन पर्वतीय जिलों को मिलाकर पृथक राज्य बनाने व उसकी राजधानी गैरसैण में बनाने की सिफारिश की।

उत्तर प्रदेश सरकार ने कौशिक समिति की सिफारिशों को २१ जून १९९४ में स्वीकार कर लिया और अगस्त सन १९९४ में 8 पहाड़ी जिलों को मिलाकर पृथक उत्तराखण्ड राज्य के गठन से सम्बंधित प्रस्ताव को विधानसभा में सर्वसम्मति से पास कर केंद्र सरकार के पास भेजा। सन १९९४ में विनोद बडथ्वाल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इस समिति को बुद्धिजीवियों और गैर- राजनैतिक लोगों के विचारों के आधार पर पृथक उत्तराखण्ड राज्य की अनिवार्यता पर सुझाव देना था।             

You are reading Uttrakhand General Knowledge