Chand Dynasty In Uttarakhand Part One

Chand Dynasty

 

चंद राज्यवंश

  • संथापकसोमचंद
  • राज्य चिन्हगाय
  • अंतिम राजामहेन्द्रचंदukgyan

राजा सोमचंद

  • कुमाऊ में चंद वंश की स्थापना सोमचंद ने की थी। कत्यूरियों के पतन के साथ कुमाऊ में चंद वंश का उदय हुआ।
  • प्रराभ्म में इस राज्य में केवल राजधानी चंपावत के आस पास का ही छेत्र सम्मिलित था, लेकिन बाद में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल तथा नेपाल के भी कुछ छेत्र पर इनका अधिकार हुआ।

राजा इन्द्रचंद

  • राजा इन्द्रचंद (सन ) ने 20 वर्ष तक राज किया।
  • यह राजा बड़ा घमंडी बताया जाता है। अपने को इंद्र के समान समझता था
  • इस राजा ने अपने यहाँ रेशम का कारोबार खोला। रेशम के कीड़ों के 7 वीं सदी में तिब्बत-राज्य में स्त्रोंगजांग गांपो की रानी लाई, और उसकी नेपाली रानी ने इसका प्रचार नेपाल तक किया। वहाँ से यह कुमाऊ में लाया गया। यह कारोबार गोरख्याली राज्य तक बराबर चलता रहा।गोर्ख्योलमें यह उत्तम कारोबार नष्ट हो गया। रेशम के कीड़ों के चारे के वास्ते शहतूत(कीमू) के पेड़ बहुत बोये गये।

राजा ज्ञानचंद उर्फ़ गरुड़ज्ञानचंद

  • राज्याधिकार पाने पर राजा ज्ञानचंद ने सबसे पहला काम जो किया, वह दिल्ली नरेश के पास जाने का था।
  • राजा ज्ञानचंद ने दिल्ली के बादशाह के यहाँ चिट्टी भेजी कि तराई-भावर प्रान्त मुद्दत से कुमाऊ राज्य का हिस्सा रहा है। पहले कत्यूरियों के हाथ में था, अब चंद राजाओं के अधिकार में होना चहिये।
  • बादशाह मुह्हमद तुगलक उस समय शिकार पर थे। राजा भी वहाँ चले गये। वहाँ उन्होंने तीर कमान से उड़ते हुए गरुड़ को मार डाला, जो एक सर्प को पकड़कर ले जा रहा था। बादशाह तुगलक राजा साहब के कौशल से खुश हो गये।
  • उसी समय फरमान लिखा कि तराई-भावर का इलाका भागीरथी गंगा तक कुमाऊ के राजा के अधिकार में रहेगा। साथ ही उनकोगरुड़की उपाधि से विभूषित किया। तब से यह राजा गरुड़ज्ञान चंद के नाम से प्रसिद्ध हुए।
  • इनके शाशन काल में बहुत मार- काट हुई।
  • नीलू कठायत नामक सेनापति राजा गरुड़ज्ञानचंद के दरबार में था।

राजा उद्यानचंद

  • राजा उद्यानचंद ने चंपावत में बालेश्वर मंदिर का निर्माण कराया, यह गरुड़ज्ञानचंद के पौत्र थे।
  • इनके राज्य का विस्तार इनकी मृत्यु के समय था - उत्तर में सरयू से लेकर, दक्षिण में तराई तक, पूर्व में काली से लेकर, पश्चिम में कोसी व् सूँवाल तक।

राजा रत्नचंद

  • चंदो में सबसे पहला भूमि बंदोबस्त राजा रत्नचंद ने ही कराया था।
  • इन्होने 27 वर्ष तक शाशन किया और 1488 में स्वर्ग को सिधारे।

राजा भीष्मचंद

  • राजा भीष्मचंद 1555 में गद्दी पर बैठे, इनकी कोई संतान न थी।
  • इन्होने राजा ताराचंद के पुत्र कल्याणसिंह को गोद लिया था।
  •  राजा भीष्मचंद ने राजधानी चम्पावत से हटाकर किसी केंद्र के स्थान में रखने की सोची। तब राजा ने खगमरा के किले का जीर्णोधार कर उसे राजधानी स्थापित करने का इरादा किया और वहाँ आलमनगर की नीव भी डाली।
  • खस जाति श्रीगजुवाठिंगा नामक एक सरदार ने सेना एकत्र कर, खगमराकोट के किले पर चढाई कर दी। जब राजा भीष्मचंद किले में सो रहे थे तो खस राजा ने चुपके से वहाँ जाकर राजा भीष्मचंद का सिर काट दिया और उसके बहुत से साथियों को मौत के घाट उतार दिया। श्रीगजुवाठिंगा ने खुद को बारामण्डल का राजा बना दिया पर उसकी यह स्वतंत्रा ज्यादा दिन न चली।
  • ज्यों ही यह खबर कल्याणचंद तक पहुची उसने अपने पिता की मृत्यु का जोरदार बदला लिया और सबको क़त्ल किया।

राजा बालो कल्याणचंद

  • राजा बालो कल्याणचंद ने सन 1563 में अल्मोड़ा नगर बसाया और यहाँ चंद राजाओं की राजधानी स्थापित की।
  • कहते हैअल्मोड़ा घास ले जानेवाली अल्मोडियों से अल्मोड़ा नाम पड़ा। पहले इसे आलमनगर नाम दिया गया, नाम आलमनगर तो चला नहीं, अल्मोड़ा ही चल पड़ा।
  • इसके अलावा इसे राजापुर नाम से भी जाना जाता था।

राजा रुद्र्चंद

  • राजा रुद्र्चंद 1568 में गद्दी पर बैठे तब वह बहुत ही छोटे थे। हुस्सैनखां टुकुडिया नामक दिल्ली के एक सूबेदार ने तराई- भावर छेत्र पर कब्ज़ा किया।
  • इसने पर्वतीय छेत्र में भी लूटपाट मचाई(दो बार) मंदिर तोड़े, व् लूट मचाई पर इसकी फौज बरसात के मौसम की वजह से पहाड़ों में टिक न पाई।
  • इसकी मृत्यु के बाद राजा रुद्र्चंद ने फौज एकत्रित कर तराई पर फिर से अधिकार किया। जब इसकी शिकायत दिल्ली पहुची तो दिल्ली से नवाब कटघर बड़ी सेना लेकर चढ़ आये, उस फौज के सामने राजा की फौज कुछ भी न थी।
  • राजा ने यह पेशकश कि की सारी फौज न लड़कर दोनों तरफ से एक-एक योद्धा भेजें जिनमे लड़ाई हो, और जो जीते भावरतराई का छेत्र उसका। राजा अपनी तरफ से स्वंय गये और विजयी भी रहे।
  • इस तरह का युद्ध इकफा कहा जाता था। राजा रुद्र्चंद की बहादुरी की खबर सुनकर अकबर ने उन्हें लाहौर बुलाया और वहाँ नागौर की लड़ाई में भेजा। उस युद्ध में राजा व् कुमाउनी सेना ने बड़ी बहादुरी दिखाई, जिससे प्रसन्न होकर अकबर ने राजा रुद्र्चंद को चौरासी माल का फरमान दिया और खिल्लत भी दी।
  • चौरासी माल तराई- भावर को कहते है, यह 84 कोस का टुकड़ा था। राजा रुद्र्चंद को दरबार में आने से बरी भी कर दिया।
  • राजा रुद्र्चंद ने रुद्रपुर नामक शहर बसाया, वहाँ महल व् किला भी बनवाया, तराईभावर में निरंतर उपद्रव होते रहते थे, किन्तु सबसे प्रथम राजा रुद्र्चंद ने इसका पक्का इन्तेजाम किया।
  • दिल्ली से अल्मोड़ा लौटने पर राजा ने मल्ला महल का निर्माण कराया। इस समय वहां कचहरी व् खजाना है।
  • राजा के दो कुंवर थे, जिनमे से बड़े जन्म से अंधे कुँ. शक्ति सिंह गोसाई थे। दुसरे बेटे कुँ. लक्ष्मीचंद कहते है, यह शक्ति थी की अपने सामने आदमी खड़ा करना, फिर उस आदमी के बोलने पर यह जान लेना कि अपने और उस आदमी के बीच कितना अंतर है। इसी तरह शक्ति सिंह गोसाई ने, कहते है, तमाम जिले की नाप की थी, और बंदोबस्ती शब्द जो कागजातों में आये है जैसे कि, बेलका, नाली, काछ, रत्ती, यासा, पैसा, बीसी, ज्युला सब नाम उन्ही के चलाए है। कहते है की आँखे खुल जाने के लिए गोंसाईजी ने ज्वालामुखी मंदिर में तपस्या की थी पर आँखे तो न खुली, पर जमीन की नाप तथा अन्य राज्य प्रबन्ध का ज्ञान उन्हें काफी हो गया था।

 

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