Chand Dynasty In Uttarakhand Part two

chand dynasty

राजा लक्ष्मीचंद

  • राजा रुद्र्चंद के बाद लक्ष्मीचंद गद्दी पर बैठे, शक्ति सिंह गुसाईं बड़े होने के नाते राजा के उत्तराधिकारी थे। किन्तु अंधे होने की वजह से शक्ति गुसाईं ने अपने छोटे भाई लक्ष्मीचंद के लिए राज गद्दी छोड़ दी।
  • अंधे होने पर भी शक्ति सिंह गुसाईं को ज्ञान बहुत था विशेषकर नाप का। अतः राजा लक्ष्मीचंद ने उनको मुल्क व् दरबार का इंतज़ाम करने को कहा।
  • शक्ति गुसाईं ने जमीन की नाप का दफ्तर बनाया। जमीन के ऊपर ‘रकम’ (कर) लगाई। ज्युला, सिरती, बैरक, रक्षया, कूत, भात, वगैरह करों का नाम रखा।
  • सिपाहियों को कटक यानी फौज में भर्ती करते समय उनकी परीक्षा लेने का प्रबंध भी किया गया। वीर सैनिक तथा बूढ़े सिपाहियों को जमीने व् जागीर दी गई। राजा लक्ष्मीचंद ने अल्मोड़ा में महादेव का मंदिर बनाया, महादेव का नाम लक्ष्मीश्वर रखा।
  • राजा लक्ष्मीचंद ने सात बार गढ़वाल पर चढाई की, और साथ बार यह हारे। इस कारण लोगों ने जिसे किले से राजा लड़ते थे उसका नाम ‘स्यालबूंगा’ रखा। आठवी बार भी बागेश्वर में देवी- देवताओं की पूजा कर गढ़वाल पे आक्रमण किया, राजा की कुछ महत्वपूर्ण विजय तो नहीं हुई, किन्तु इस बार वह लूट-खटोसकर कुछ धन एकत्र किया। इससे खुश होकर राजा अल्मोड़ा लौटे।
  • पंडित रुद्रदत्त पंतजी लिखते है “इस राजा ने गढ़वाल को सर करने की खबर अल्मोड़ा पहुचाने के लिए पहाड़ों की चोटी पर सुखी घास व् लकड़ियाँ के ढेर लगाये कि जिस समय गढ़वाल का प्रदेश जीत लिया जाएगा, उन ढेरों में आग लगाई जाए, ताकि खबर अल्मोड़ा जल्द पहुच सकें”। जीत के समय ऐसा ही किया गया।
  • तब से अश्विन की सक्रांति के दिन सांयकाल के समय घास का आदमी सा बनाकर उसमे फूल-कांस इत्यादि लगाकर लड़के जलाते है। गाते, नाचते, व् कूदते है - “भैलो जी भैलो , भैलो खतडवा”
    गैद्दा की जीत, खतड की हर ;
    गैद्दा पडों श्योल, खतड पड़ा भ्योल।

यह उत्सव खतडवा कहलाता है। गैद्दा कुँमौन के राजा के सेनापति थे, खतडसिंह कहा जाता है गढ़वाल के सेनापति थे। वह युद्ध में मारे गये। राजा रुद्र्चंद व् लक्ष्मीचंद के समय कोई भारी विजय तो नहीं बस कुछ एक सरहदी लडाइयों में विजय प्राप्त हुई। राजा लक्ष्मीचंद जहाँगीर के दरबार में भी गये थे।

राजा बाज बहादुर चंद

  • 1638 में गद्दी पर बैठे, यह बाजचंद या बाजाचंद के नाम से भी जाने जाते है। उस समय भावर-तराई का इलाका फल-फूल रहा था, वहां सालाना 9 लाख तक की आमदनी हो रही थी।
  • लक्ष्मीचंद और बाजचंद के मध्य राज करने वाले राजाओं का समय घरेलू लड़ाई में ही बीता और वह तराई पर ध्यान न दे सके। इस वहज तराई पर पर कठेर के हिन्दू मुखिया का कब्ज़ा हो गया था।
  • राजा बाजचंद अपनी शिकायत लेकर बादशाह शाहजहाँ के पास पहुचे। खूब सारे तोहफे भी ले गये – चंवर गाय, कस्तूरी मृग, चँवर, सोने चाँदी के बर्तन इत्यादि। राजा ने बादशाह को कठेडियों की जुल्म की दास्तान सुनाई।
  • बादशाह ने कहा इस समय लड़ाई है, वो भी युद्ध में शामिल हो जावे और जीत में उन्हें भावर- तराई का छेत्र दिया जाएगा। वहाँ उस समय 1654-55 में गढ़वाल सेना भेजी जा रही थी, ये भी वहाँ भेजे गये।
  • गढ़वाल के युद्ध में राजा ने बहुत बहादुरी दिखाई , इसलिए इन्हें बहादुर की उपाधि दी गयी। राजा को जीत में वादेअनुसार तराई का छेत्र भी मिला। बाजपुर नामक सहर बाजचंद ने ही बसाया था।
  • इन्होने गढ़वाल बधानगढ़ व् लोहबागढ़ दोनों पर चढाई की, और जुनागढ़ का किला भी छीना, वहाँ से नंदादेवी को लाये और मल्लामहल में स्थापित किया। इस राजा का शाशन-काल काफी तेजस्वी रहा। इन्होने कई परगने फतह किये।
  • राज्य का विस्तार बढाया और कई नये सुधार किये, पर भाग्य की बात, इनका अंतिम काल बहुत बुरा रहा। शाहजहाँ की तरह इनको उन्माद हो गया था, इनके पुत्र कुँवर उद्योत चंद ने भी शाशन की बागडोर सँभालने के लिए बगावत की थी। राजा को हरवक्त संदेह रहता था की कब कोई मार डाले, इस भय से की कोई उन्हें मार न डाले। इसलिए उन्होंने अपने सब पुराने नौकर निकाल दिए, राजा की मृत्यु सन 1680 में अल्मोड़ा में हुई।

राजा उद्योत चंद

  • उद्योत चंद राजा बाज बहादुर चंद की मृत्यु के पश्चात निर्विरोध व् ख़ुशी के साथ राजा बने। लोग भी प्रसन्न हुए की बुढा अन्यायी राजा मर गया है।
  • अपने पिता की तरह यह भी विद्या अनुरागी तथा शिक्षा-प्रेमी थे। इन्होने दूर-दूर देशों के विद्वानों को अपने यहाँ, बुलाया और कुमाऊ में बसने का मौका दिया।
  • इन्होने तल्ला महल का निर्माण करवाया। यह राजा धर्म-कर्म के बड़े पक्के थे। इन्होने कई मंदिर बनवाये एवं यज्ञ किये।
  • अपना अंतिम समय आते देखकर इन्होने अपने जीवन का अंतिम समय पूजा व् प्रार्थना में व्यतीत किया और अपने पुत्र ज्ञानचंद को गद्दी सौंप परलोक सिधार गये।

राजा ज्ञानचंद

  • राजा ज्ञानचंद को वैसे राजकाज इनके पिता राजा उद्योत चंद ने पहले ही सौंप दिया था। पूर्व के राजाओं द्वारा प्राय: गद्दी पर बैठते ही डोटी (तब का एक स्वतंत्र राज्य) पर चढाई करते थे वैसे ही अब चंद वंश के उत्तराधिकारी ने गढ़वाल पर चढाई करने का नियम सा बना लिया था।
  • 1703 पर गढ़वाल पर आक्रमण कर राजा ज्ञानचंद की फौज श्रीनगर गढ़वाल (गढ़वाल की राजधानी) तक पहुच गयी थी।
  • 10 वर्ष तक राज कर यह स्वर्गसिधार गये, इनके बाद इनके पुत्र कुं. जगतचंद गद्दी पर बैठे।

राजा जगतचंद

  • इन्होने भी गद्दी पर बैठते ही पिंडारी व् लोहबा के रास्ते गढ़वाल पर चढाई की, गढ़वाल के राजा विवश होकर देहरादून भाग गये।
  • गढ़वाल का राज्य इन्होने एक ब्राह्मण को दान में दे दिया। लूट में प्राप्त धन को इन्होने गरीबों व् अपने सिपाहियों में बाँट दिया। कुछ धन नजराने में दिल्ली के बादशाह महम्मद शाह के पास भी भेजा।
  • इन्होने जुए के ऊपर राज-कर बैठाया। इतिहासकार एटकिन्सन के मुताबिक राजा ने यह आमदनी भी दिल्ली दरबार भेजी।
  • राजा जगतचंद का स्वभाव बहुत मिलनसार तथा उच्चे दर्जे का बताया जाता है, वह प्रजा प्रिय राजा थे। सबसे प्रेमपूर्वक मिलते थे और राज-काज में खूब दिलचस्पी लेते थे।
  • चंद वंश का साम्रज्य इनके समय अपने चरम पर था। चारो ओर शांति थी, प्रजा सुखी थी। इनके बाद से ही घरेलू झगड़े आरम्भ हुए, राजा की पकड़ पहाड़ व् मैदान दोनों जगह ढीली होने लगी और चंदवंश की अवनति होने लगी। इस राजा के समय दो ग्रन्थ बने
  1. टीका जगतचन्द्रिका
  2. टीका दुर्गा की

राजा देवीचंद

  • राजा जगतचंद ने श्रीनगर गढ़वाल का मुल्क जीतकर ब्राह्मण को संकल्प करके दिया था। गढ़वाल के राजा ने फिर अपना मुल्क अपने अधिकार में ले लिया। इसकी खबर पाकर राजा जगतचंद के पुत्र देवीचंद फिर फौज लेकर श्रीनगर पर चढाई की, जिसमे वह सफल हुए। लुटपाट मचाते हुए राजा वापिस आ गये।
  • इस राजा के समय खजाने में साढ़े तीन करोड़ रुपये नगद जमा थे, इतना धन देखकर राजा का मन उछलने लगा। राजा देवीचंद कमजोर शाशक थे व् अपने सलाहकारों के हाथ की कठपुतली थे।
  • चापलूस दरबारियों की सलाह पर राजा को विक्रमादित्य बनने की सूझी, राजाज्ञा निकाली गयी – “राज्य में सब ब्राह्मणों का कर्ज दूर करता हूँ, सव हाज़िर होवे” । कर्ज माफ़ी की खबर सुनते ही कर्जदार आ धमके तकरीबन एक करोड़ रूपया कर्ज माफ़ी में चला गया। जिसका न जाने कितना हिस्सा धूर्त दरबारियों के पेट में चला गया।
  • राजा के ऐसे पागलपन के कई किस्से है। राजा देवीचंद के पागलपन की वजह से ही उसे चंद वंश का तुगलक कहा गया।
  • सन 1726 की एक रात को जब राजा देवीचंद सोये थे तो मानिक गैंडा, पूरनमल गैंडा बिष्ट ने अपने साथ रणजीत पतौलिया को मिलाकर, सोते हुए राजा की गला घोंटकर हत्या कर दी। और यह खबर प्रकाशित कर दी की राजा को सांप ने काट दिया है।
  • राजा का कोई वारिस न होने से पूरा राज काज इन् दोनों, धूर्त, पापी एवं विस्वासघाती मंत्रियों के पास आ गया।

राजा अजीतचंद

  • राजा देवीचंद का कोई वारिस न होने के वजह से दरबारियों ने राजा ज्ञानचंद के नाती अजीतचंद को गद्दी पर बैठाया।
  • यह राजा दरबारियों के हाथ की कठपुतली मात्र था। सारा राज काज मानिक गैंडा व पूरनमल गैंडा बिष्ट के हाथ में ही था, इन्होने बहुत अन्याय किये। जिसे कुमाऊ में गैंडागर्दी के नाम से जाना जाता है।
  • राजा अजीतचंद भी इसी गैंडागर्दी के शिकार हुए उन्हें भी मानिक चंद व् पूरनचंद ने लात, घूंसों से पीटकर लकवाग्रस्त कर दिया और अंततः राजा अजीतचंद मारे गये।

राजा कल्याणचंद (पंचम)

  • राजा अजीतचंद की मृत्यु के पश्चात इनके 18 दिन के पुत्र राजा कल्याणचंद (पांचवे) को राज्यधिकारी बनाया गया।
  • इनके वयस्क होने तक कुमाऊ गैंडागर्दी का शिकार होता रहा। व्यस्क होने पर इन्हें जब इस अन्याय और क्रूरता का पता चला तो इन्होने हुक्म दिया की पापी मानिक गैंडा व पूरनमल गैंडा को राजा के सामने ही मार दिया जाये।
  • राजा को खून का नशा चड गया, राजा ने बिष्टों को मार कर सन्तोष न किया, बल्कि हुक्म दिया की कुमाऊ में जितने चंदवंश के लोग है उन्हें मार दिया जाए।
  • इस राजा के राज्यकल में बहुत खूनखराबा हुआ, कई लोगों की आँखे निकलवा दी गयी। राजा को राजपाठ की न कोई जानकारी थी न ही कोई मार्ग प्रशस्त करने वाला। कर्मचारी राजा को भड़काकर अपना उल्लू साधते थे।
  • राजा के कमजोर शाशन का फायदा उठा रोहिलों ने कुमाऊ पर चड़ाई कर दी, नवाब अलीमहम्मद शाह की फौज कुमाऊ पर चढ़ आई। श
  • त्रुओं के आक्रमण से राजा कल्याणचंद को कुछ विवेक आया की उसने अपनी लापरवाही से बहुत शत्रु पैदा कर दिए। उसने शाशन सुधारने की ठानी, पुराने कर्मचारियों को अलग भी किया। पर फिर भी राजदरबार में चापलूस व् कुटिल नीतिवाले लोगों की कमी न थी। पंडित शिवदेव जोशी को तराई का पूर्ण अधिकार सौंपा।
  • शिवदेव जोशी ने फौज एकत्र करने व् किल्लेबंदी करने के लिए राजा से धन माँगा ताकि रोहिले कुमाऊ में न आ पाए। पर दरबारियों ने राजा को उल्टी पट्टी पढाई कहा की – ‘‘शिवदेव अपने लिए धन मांगता है’’। फरत्याल धड़े के लोगों ने राजा से धन लेकर लकड़ियाँ काट कर रास्ते बंद कर दिए और राजा से कहा – “गौन व गल्याट सब बंद कर दिए है, पुल तोड़ दिए गये है” इस प्राकृतिक दुर्गरुपी कुमाऊ में कोई शत्रु कैसे आ सकता है। राजा इन् बातों से खुश हो गये, केवल कुछ छोटे-छोटे लकड़ी के किले रास्ते में बनाये गये।
  • रोहिलों ने 1743-44 में शिवदेव जोशी को रुद्रपुर में हराकर, भीमताल के नीचे परगना छखाता में विजयपुर पर अधिकार कर लिया। राजा ने ये खबर सुनकर सेना भेजी, पर विजयनगर में लड़ाई होते ही राजा की फौज को खेत छोडकर भागना पड़ा, और शत्रु उनका पीछा कर रामगाड, प्युडा होता हुआ सुआल नदी द्वारा अल्मोड़ा चड़ आया। भागती हुई फौज ने मानो पथदर्शक का काम किया।
  • राजा कल्याणचंद बिना लड़े ही भागकर लोहाबा के पास गैरमांडा में जा बैठे। वहाँ से गढ़वाल के राजा से सहायता मांगी।
  • मुसलमानों ने अल्मोड़ा पहुचकर सब मंदिर तोड़ दिए, सोने-चाँदी की मूर्तियाँ, कलश, बर्तन आदि गलाकर सब अपने साथ ले गये। लोग घर छोडकर जंगलो में भाग गये, रोहिलो ने राजसी दफ्तर व् कागजात जला दिए। जिस वजह से कुमाऊ के इतिहास की सामग्री को भारी नुकसान हुआ।
  • रोहिले 7 महीने तक कुमाऊ में रहे। एक संधि हुए जिसमे कुमाऊ छोड़ने के अवज में राजा ने रोहिल्लो को 3 लाख रुपिये नगद दिए। यह धन गढ़वाल नरेश प्रदीपशाह ने उधार दिए थे।
  • राजा प्रदीपशाह अपने साथ राजा कल्याणचंद को लाये और उन्हें कुमाऊ की गद्दी पर विराजित किया। दोनों राजाओं के इस बीच काफी घनिष्ठता बड़ी। जो कुछ बर्बादी मंदिर, महलों तथा किलों की रोहिलों ने की थी कल्यांचंद ने उसकी मरमत करायी। लोगों को बुलाकर उनके सामने पछतावा किया और भविष्य में सावधान रहने की प्रतिज्ञा की।
  • सन 1745 में रोहिलों ने दोबारा आक्रमण किया, इस बार कुमाऊ की फौज ने अदम शाहस एवं वीरता दिखाते हुए रोहिलों को मार भगाया। अपने अन्त समय में राजा कल्याणचंद को आँखों की बीमारी हो गयी थी, सभी ने इस बीमारी को राजा के लिए कुकर्मो का फल माना।
  • राजा ने मृत्यु से पूर्व अल्पवयस्क कुँवर दीपचंद को राजगद्दी सौंपी और पं. शिव देव जोशी को राज्य का संरक्षक बनाया।

राजा दीपचंद

  • राजा दीपचंद गद्दी पर बैठते समय बाल्यवस्था में थे, पं. शिवदेव जोशी ने ही सम्पूर्ण राज्यकाज संभाला।
  • इस राजा के समय की सबसे महत्वपूर्ण घटना पानीपत का तीसरा युद्ध है। सन 1761 में मराठों के विरुद्ध लड़ाई में दिल्ली सल्तनत ने कुमाऊ नरेश से मदद मांगी थी। 4000 कुमाउनी सैनिक सेनापति हरिराम एवं उप-सेनापति बीरबल नेगी के आधिपत्य में भेजी गयी। इस लड़ाई में कुमाऊ सेना और रोहिल्ले एक साथ मिलकर मराठो का सामना किया।
  • कुमाऊ सेना ने गजब का शाहस एवं वीरता दिखाई, सन 1962 में युद्ध खत्म होने पर कुमैया सेना वापिस लौट आई।
  • राजा दीपचंद के समय की दूसरी मत्वपूर्ण घटना गढ़वाल के राजा प्रदीपशाह के साथ युद्ध है। राजा प्रदीपशाह ने मांग रखी कि
  1. राजा दीपचंद उनको चाचा मान कर पत्रों में जयदेव लिखें.
  2. कुमाऊ द्वारा दबाये गये गढ़वाल के सारे छेत्र को वापिस करे अन्यथा गढ़वाल के राजा सारे कुमाऊ पर अधिकार कर लेगा।
  3. रामगंगा को गढ़वाल, कुमाऊ की सरहद मानी जाए
  • राजा दीपचंद ने प्रथम दोनों मांगे मान ली, परन्तु रामगंगा को सरहद मानने से इंकार कर दिया। अपने सलाहकारों की बातों में आकर गढ़वाल राजा ने आक्रमण कर दिया, तामाढ़ोंन के पास युद्ध हुआ। गढ़वाल राजा की बहुत बुरी हार हुई, राजा जान बचाकर जैसे तैसे वापिस अपने राज्य की तरफ भागे।
  • पं. शिवदेव जोशी ने भागते हुए राजा का पीछा न कर धर्म एवं बहादुरी का काम किया। इस बात से राजा प्रदीपशाह प्रभावित हुए। फिर दोनों राजाओं के बीच संधि हुई, पगड़ी का आदान प्रदान हुआ। इस तरह आपसी भाईचारा एवं शांति स्थापित हुई। पं. शिवदेव जोशी ने बड़ी कुशलता से राज्य चलाया, जरुरत पड़ने पर दमनकारी नीति भी अपनाई। राजा की भी इनपर कृपा बनी रही।
  • सन 1764 में पं. शिवदेव जोशी का काशीपुर में निधन हो गया। इनके मृत्यु के साथ ही चंद वंश की जड़े उखड़ने लगी।

राजा मोहनचंद

  • मोहनसिंह ने राजा दीपचंद एवं उसके पुत्रों को षड्यंत्र रच मार डाला और स्वयं मोहनचंद के नाम से गद्दी पर बैठ गया।
  • इसी राजा के समय में गढ़वाल के राजा ललितशाह ने कुमाऊ पर आक्रमण कर अपने अधीन कर दिया।
  • राजा प्रदीपशाह के पुत्र राजा ललितशाह को पं. शिव देव जोशी ने पत्र भेज, राजा मोहनचंद के खूनी शाशन पर अंकुश लगाने के लिए आमंत्रित किया था। सेनापति प्रेमपति खंडूरी की अगुवाई में राजा ललितशाह की फौज आगे बड़ी और अल्मोड़ा को जीता।
  • मोहनचंद अपनी जान बचाकर लखनऊ के नवाब की शरण में चले गये और फिर वहाँ से रामपुर।

राजा प्रद्युम्नचंद

  • राजा ललितशाह ने अल्मोड़ा पहुँच, पं. शिवदेव जोशी की सलाह पर अपने बेटे प्रद्युम्न शाह को राजा दीपचंद का धर्मपुत्र बना का राजा प्रद्युम्नचंद के नाम से चंदो की राजगद्दी पर बैठाया।
  • राजा ललितशाह की मलेरिया से पीड़ित हो कर मृत्यु हो गयी,अतः उनके बड़े पुत्र जयकीर्ति शाह गढ़वाल की राजगद्दी पर बैठे।
  • राजा जयकीर्ति शाह ने पत्र भेज राजा प्रद्युम्नचंद को लिखा की वे यथोचित सम्मान दिखाए एवं पत्र द्वारा भी सम्मान सूचित करें। जिसके जबाव में लिखा गया की कुमाऊ ने कभी गढ़वाल की कभी भी महत्ता स्वीकार नहीं किया है और वह हर तरह से उस गद्दी की मान-प्रतिष्ठा की रक्षा करंगे, जिस पर की वह बैठे है। इस उत्तर को सुनकर गढ़वाल के राजा निरुतर हो गये, पर दिल ही दिल में रूठ गये।
  • इस दौरान गद्दी से भगाए हुए मोहनचंद राज्य वापिस पाने की कोशिस करने लगे। 1400 नागो की फौज लेकर मोहनचंद ने प्रयास भी किया जिसे हर्षदेव जोशी ने विफल किया। सुशिक्षित राजा के फौज के आगे नागा साधू न टिक सके।
  • इस बीच राजा जयकीर्ति शाह ने कुमाऊ पर आक्रमण कर दिया, किन्तु राजा की मृत्यु हो गयी। कुमाऊ फौज ने शिवदेव जोशी के नेतृत्व में खूब लूटपाट मचाई, मदिरो को भी लूटा। राजा जयकीर्ति शाह के मरने पर पराक्रम शाह ने राजा बनना चाहा, परन्तु राज्य के पंचो ने पं. हर्ष देव जोशी के पास सुचना भेजी कि गढ़वाल राज्य का बंदोबस्त राजा प्रद्युम्नचंद की मर्जी के मुताबिक हो।
  • निश्चय हुआ कि गढ़वाल-कुमाऊ का एक ही राजा हो, राजा प्रद्युम्नचंद दोनों राज्यों के राजा बने ये फैसला पराक्रमशाह के अतिरिक्त सभी को पसंद आया। गढ़वाल के प्रबध हेतु राजा प्रद्युम्नचंद गढ़वाल गये, कुमाऊ का प्रबंध हर्षदेव जोशी के हाथ में रहा।
  • राजा प्रद्युम्नचंद, प्रद्युम्न शाह के नाम से गढ़वाल के राजा बने। 7 वर्ष तक कुमाऊ की राजगद्दी पर बैठ कर प्रद्युम्नचंद राजा मोहनचंद के षड्यंत्र के शिकार हुए, और मजबूरीवश उन्हें कुमाऊ की राजगद्दी छोडनी पड़ी।

राजा मोहनचंद (दूसरी बार)

  • अनेकों जगह भटक-भटक कर अंततः मोहनचंद दोबारा राजगद्दी पर बैठने में कामयाब रहे। दोबारा गद्दी पर बैठते समय राज्य खजाना पुरी तरह खाली हो गया था। फौज को देने के लिए भी धन नहीं था।
  • राजा मोहनचंद ने ‘माँगा’ कर लगाया। पं. हर्ष देव जोशी ने फौज जुटाकर मोहनचंद के विरुद्ध युद्ध किया और विजय भी हासिल की। राजा मोहनचंद को कैद में डाल दिया जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी।
  • मोहनचंद के मरने के बाद पं. हर्षदेव जोशी फिर से कुमाऊ के सर्वेसर्वा बन गये पर वह अच्छी तरह से जानते थे वह किसी चंद के नाम से खुद तो राज्य कर सकते थे, किन्तु वह स्वयं राजगद्दी पर नहीं बैठ सकते।
  • राजा उद्योत चंद के एक रिश्तेदार कुं. शिवसिंह उन्हें मिले, अतः उन्ही को शिवचंद के नाम से राजा बनाया गया। यह नाम- मात्र के राजा थे। इन्होने बस एक साल राज किया।

राजा महेन्द्रचंद

  • पं. हर्षदेव जोशी ज्यादा दिनों तक कुमाऊ का प्रबंधन न सभाल सके। 1788 में राजा मोहनचंद के पुत्र महेन्द्रचंद गद्दी पर बैठे। पं. हर्षदेव जोशी गढ़वाल को भाग गये।
  • 1790 में नेपाल के गोरखाओ ने राजा महेन्द्रचंद को हवालबाग में एक साधारण से युद्ध में पराजित कर अल्मोड़ा पर अधिकार कर लिया। और फिर सम्पूर्ण कुमांऊ पर। इस प्रकार चंद राजवंश का अंत हो गया।

चंद वंश का इतिहास बहुत ही गहन एवं विस्तृत है। उस इतिहास के कुछ एक अंश यहाँ पर लिखे गये है। चंद वंश में हुए विभिन्न राजाओं के राज्यकाल के अनुरूप चंद वंश का इतिहास बताने की कोशिश की गयी है। रोहिलों एवं गोरखाओं के आक्रमण से इस इतिहास से जुडी काफी कड़ियाँ नष्ट जरूर हुई है। यह नोट्स पूर्णतः ‘कुमाऊ का इतिहास – बद्रीदत्त पाण्डे’, एवं अन्य श्रोतों से ली गयी है

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